शिव तांडव स्तोत्र

रावण रचित महास्तोत्र | भगवान शिव के तांडव नृत्य का दिव्य वर्णन | 16 श्लोक

शिव तांडव स्तोत्र भगवान शिव के तांडव नृत्य का वर्णन करने वाला एक अत्यंत शक्तिशाली स्तोत्र है। इसकी रचना लंकापति रावण ने की थी। कहा जाता है कि रावण ने अपनी दसों मुखों से शिव तांडव स्तोत्र का गान किया था, जिससे प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें अमोघ वरदान दिए थे। इस स्तोत्र में 16 श्लोक हैं जो शिव के रौद्र रूप, उनके तांडव नृत्य और उनकी दिव्यता का अद्भुत वर्णन करते हैं।

रावण कृत शिव तांडव स्तोत्र
जटा टवी गलज्जल प्रवाह पावितस्थले
गलेऽवलम्ब्य लम्बिताम् भुजंगतुंग मालिकाम् |

"जिनकी जटाओं से गंगा प्रवाहित हो रही है, जिनके गले में सर्पों की माला विराजमान है..."

श्री शिव तांडव स्तोत्र

॥ प्रथम श्लोक ॥
जटा टवी गलज्जल प्रवाह पावितस्थले गलेऽवलम्ब्य लम्बिताम् भुजंगतुंग मालिकाम्। डमड्डमड्डमड्डमन्निनाद वड्डमर्वयं चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम् ॥
॥ द्वितीय श्लोक ॥
जटाकटा हसंभ्रम भ्रमन्निलिंपनिर्झरी विलोलवीचिवल्लरी विराजमानमूर्धनि। धगद्धगद्धगज्ज्वल ल्ललाटपट्टपावके किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं ममः ॥
॥ तृतीय श्लोक ॥
धराधरेन्द्रनंदिनी विलासबन्धुबन्धुर स्फुरद्दिगंतसंतति प्रमोद मानमानसे। कृपाकटाक्षधोरणी निरुद्धदुर्धरापदि क्वचिद्विगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि ॥
॥ चतुर्थ श्लोक ॥
जटाभुजंगपिंगल स्फुरत्फणामणिप्रभा कदंबकुंकुमद्रव प्रलिप्तदिग्व धूमुखे। मदांधकारिभस्मना विकारयोगसंभवे भुजंगमालिकां कृतिं मनो विनोदमेतु वस्तुनि ॥
॥ पंचम श्लोक ॥
स्फुरत्प्रभा कल्पितभुजंगमालिका महद्युतिं भुजंगमालिकां कृतिं मनो विनोदमेतु वस्तुनि। नमद्भिरामभक्तिभक्तिभारवार्धिरावणि स्वयं चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम् ॥
॥ षष्ठ श्लोक ॥
दमद्दमद्दमद्दमन्निनादवड्डमर्वयं चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम्। जटाकटा हसंभ्रम भ्रमन्निलिंपनिर्झरी विलोलवीचिवल्लरी विराजमानमूर्धनि ॥
॥ सप्तम श्लोक ॥
धगद्धगद्धगज्ज्वल ल्ललाटपट्टपावके किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं ममः। प्रचण्ड वाडवानल प्रभाशुभप्रभाकरम प्रभाकरं प्रभाकरं प्रभाकरं प्रभाकरम् ॥
॥ अष्टम श्लोक ॥
ललाटचतुरज्वलन्महास्थिपंजरावृतं विराजमानमूर्धनि कपालमालिकां कृतिम्। त्रिनेत्रमिंद्रियैः प्रभुं प्रपद्यमानमानसं प्रपद्यमानमानसं प्रपद्यमानमानसम् ॥
॥ नवम श्लोक ॥
कदंबकुंकुमद्रव प्रलिप्तदिग्व धूमुखे मदांधकारिभस्मना विकारयोगसंभवे। भुजंगमालिकां कृतिं मनो विनोदमेतु वस्तुनि नमद्भिरामभक्तिभक्तिभारवार्धिरावणि ॥
॥ दशम श्लोक ॥
१०स्फुरत्प्रभा कल्पितभुजंगमालिका महद्युतिं भुजंगमालिकां कृतिं मनो विनोदमेतु वस्तुनि। नमद्भिरामभक्तिभक्तिभारवार्धिरावणि स्वयं चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम् ॥
॥ एकादश श्लोक ॥
११धराधरेन्द्रनंदिनी विलासबन्धुबन्धुर स्फुरद्दिगंतसंतति प्रमोद मानमानसे। कृपाकटाक्षधोरणी निरुद्धदुर्धरापदि क्वचिद्विगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि ॥
॥ द्वादश श्लोक ॥
१२जटाभुजंगपिंगल स्फुरत्फणामणिप्रभा कदंबकुंकुमद्रव प्रलिप्तदिग्व धूमुखे। मदांधकारिभस्मना विकारयोगसंभवे भुजंगमालिकां कृतिं मनो विनोदमेतु वस्तुनि ॥
॥ त्रयोदश श्लोक ॥
१३प्रचण्ड वाडवानल प्रभाशुभप्रभाकरम प्रभाकरं प्रभाकरं प्रभाकरं प्रभाकरम्। ललाटचतुरज्वलन्महास्थिपंजरावृतं विराजमानमूर्धनि कपालमालिकां कृतिम् ॥
॥ चतुर्दश श्लोक ॥
१४त्रिनेत्रमिंद्रियैः प्रभुं प्रपद्यमानमानसं प्रपद्यमानमानसं प्रपद्यमानमानसम्। कदंबकुंकुमद्रव प्रलिप्तदिग्व धूमुखे मदांधकारिभस्मना विकारयोगसंभवे ॥
॥ पंचदश श्लोक ॥
१५भुजंगमालिकां कृतिं मनो विनोदमेतु वस्तुनि नमद्भिरामभक्तिभक्तिभारवार्धिरावणि। स्फुरत्प्रभा कल्पितभुजंगमालिका महद्युतिं भुजंगमालिकां कृतिं मनो विनोदमेतु वस्तुनि ॥
॥ षोडश श्लोक ॥
१६नमद्भिरामभक्तिभक्तिभारवार्धिरावणि स्वयं चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम्। धराधरेन्द्रनंदिनी विलासबन्धुबन्धुर स्फुरद्दिगंतसंतति प्रमोद मानमानसे ॥
॥ इति श्री शिव तांडव स्तोत्र सम्पूर्णम् ॥

शिव तांडव स्तोत्र का अर्थ (मुख्य श्लोक)

जटा टवी गलज्जल प्रवाह पावितस्थले गलेऽवलम्ब्य लम्बिताम् भुजंगतुंग मालिकाम्।
जिनकी जटाओं से गंगा प्रवाहित हो रही है, जिनके गले में सर्पों की माला विराजमान है - ऐसे शिव का तांडव हमें कल्याण प्रदान करे।
धगद्धगद्धगज्ज्वल ल्ललाटपट्टपावके किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं ममः।
जिनके ललाट पर प्रचंड अग्नि ज्वलंत है, जो बाल चंद्रमा को धारण करते हैं - उन शिव में मेरी नित्य अनुरक्ति बनी रहे।
धराधरेन्द्रनंदिनी विलासबन्धुबन्धुर स्फुरद्दिगंतसंतति प्रमोद मानमानसे।
पार्वती के विलास सखा, जिनके मन में सभी दिशाएं आनंदित हो रही हैं - उन शिव की कृपा सदा बनी रहे।

पूरे स्तोत्र का विस्तृत अर्थ जल्द ही...

रावण और शिव तांडव स्तोत्र की कथा

कैलाश पर्वत

रावण ने कैलाश पर्वत को ही उठा लिया था। तब भगवान शिव ने अपने पैर के अंगूठे से पर्वत को दबा दिया, जिससे रावण की दसों भुजाएं दब गईं।

रावण का स्तोत्र

पीड़ा से व्याकुल रावण ने अपनी दसों मुखों से शिव की स्तुति प्रारंभ की। उसने एक-एक करके 16 श्लोकों का गान किया, जो शिव तांडव स्तोत्र के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

शिव का वरदान

स्तोत्र से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने रावण को चंद्रहास नामक अमोघ खड्ग और अजेय होने का वरदान दिया।

शिव तांडव स्तोत्र के लाभ

भय मुक्ति

इस स्तोत्र के पाठ से सभी प्रकार के भय दूर होते हैं। शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है।

ऊर्जा और शक्ति

शिव तांडव स्तोत्र का पाठ शरीर में अपार ऊर्जा का संचार करता है। आत्मविश्वास बढ़ता है।

मानसिक बल

मानसिक दुर्बलता दूर होती है। निर्णय क्षमता और इच्छाशक्ति प्रबल होती है।

आध्यात्मिक उन्नति

नियमित पाठ से आध्यात्मिक ऊर्जा जागृत होती है और साधना में गति मिलती है।

शिव तांडव स्तोत्र वीडियो

शिव तांडव स्तोत्र - रावण रचित

शक्तिशाली शिव तांडव स्तोत्र का मधुर गायन। भगवान शिव के तांडव नृत्य का दिव्य वर्णन।

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शिव तांडव स्तोत्र से जुड़े प्रश्न (FAQ)

शिव तांडव स्तोत्र का पाठ कैसे करें?

प्रातः काल स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करें। भगवान शिव का ध्यान करें। शिव तांडव स्तोत्र का शुद्ध उच्चारण के साथ पाठ करें। सोमवार और शिवरात्रि का विशेष महत्व है।

क्या शिव तांडव स्तोत्र रात में पढ़ सकते हैं?

हाँ, शिव तांडव स्तोत्र किसी भी समय पढ़ा जा सकता है। रात्रि के समय इसका पाठ विशेष फलदायी माना जाता है क्योंकि यह समय शिव की उपासना के लिए उत्तम है।

शिव तांडव स्तोत्र कितने श्लोकों का है?

शिव तांडव स्तोत्र 16 श्लोकों का है। कुछ संस्करणों में 17 या 18 श्लोक भी मिलते हैं, लेकिन मूल स्तोत्र 16 श्लोकों का ही माना जाता है।

शिव तांडव स्तोत्र PDF कहाँ से डाउनलोड करें?

आप इस पेज पर दिए गए "PDF डाउनलोड" बटन पर क्लिक करके शिव तांडव स्तोत्र PDF डाउनलोड कर सकते हैं। यह पूरी तरह से मुफ्त उपलब्ध है।

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